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राजस्थान पंचायती राज || Rajasthan Panchayati Raj

 Rajasthan Panchayati Raj राजस्थान पंचायती राज की पूरी जानकारी

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महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज्य की कल्पना की थी। पंचायती राज ग्राम स्वराज्य का आधार है। उन्होंने पंचायती राज व्यवस्था का उल्लेख अपनी पुस्तक ‘माई पिक्चर ऑफ फ्री इंडिया‘ में किया है।

संविधान के भाग IV में नीति निदेशक तत्वों के अनुच्छेद 40 में भी इसका प्रावधान किया गया।

ग्रामीण विकास में जनसहभागिता प्राप्त करने एवं अधिकार व शक्तियों के प्रजातांत्रिक विकेन्द्रीकरण हेतु सलाह देने के उद्देश्य से जनवरी, 1957 में श्री बलवंतराय मेहता समिति की स्थापना की गई। इस समिति ने 24 नवम्बर, 1957 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें सत्ता के विकेन्द्रीकरण पर बल देते हुए देश में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की स्थापना की सिफारिश की गई।

इन सिफारिशों की क्रियान्विति में 2 अक्टूबर, 1959 को सर्वप्रथम राजस्थान में नागौर जिले में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा वर्तमान त्रिस्तरीय Panchayati Raj पंचायती राज व्यवस्था का उद्घाटन किया गया। उस समय राजस्थान के मुख्यमंत्री स्व. श्री मोहनलाल सुखाड़िया लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण के प्रबल समर्थक थे।

पंचायतों की व्यवस्था के लिए तो पहले से ही ‘राजस्थान पंचायत अधिनियम, 1953′ लागू कर दिया गया था तथा इसके तहत् राज्य में पहली बार ग्राम पंचायतों हेतु चुनाव फरवरी, 1954 में सम्पन्न हुए परन्तु 1959 में पंचायत समितियाँ और जिला परिषदों की स्थापना के लिए ‘राजस्थान पंचायत समिति और जिला परिषद् अधिनियम, 1959′ बनाया गया।

पंचायती राज व्यवस्था में सुधार हेतु सुझाव देने के लिए राजस्थान सरकार द्वारा 1964 में यह अध्ययन दल गठित किया गया। इसकी महत्वपूर्ण सिफारिश यह थी कि पंचायत समिति के प्रधान तथा जिला परिषद् के प्रमुख का चुनाव इन संस्थाओं के सदस्यों द्वारा किये जाने के स्थान पर वृहत्तर निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाना चाहिए जिसमें ग्राम पंचायत के अध्यक्ष तथा सभी सदस्य सम्मिलित है।

गिरधारीलाल व्यास समिति : 1973 में राज्य सरकार द्वारा गठित समिति जिसने प्रत्येक पंचायत के लिए ग्राम सेवक तथा सचिव नियुक्त करने तथा पंचायती राज संस्थाओं को पर्याप्त वित्तीय संसाधन दिये जाने पर बल दिया।

अशोक मेहता समिति :Panchayati Raj Notes पंचायती राज व्यवस्थाओं का मूल्यांकन करने तथा इस प्रणाली को और अधिक कारगर बनाने हेतु सुझाव देने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा 1977-78 में अशोक मेहता समिति का गठन किया गया। इस समिति ने जिला स्तर और मंडल स्तर पर द्वि-स्तरीय पंचायती राज प्रणाली स्थापित करने की सिफारिश की थी। इन्होंने मण्डल स्तर पर ‘मंडल पंचायत’ को लोकतांत्रिक विकेन्द्रकरण का केन्द्र बिन्दू बनाने का सुझाव दिया।

एल.एम.सिंघवी समिति : 1986 में केन्द्र सरकार द्वारा गठित इस समिति द्वारा पंचायतीराज संस्थाओं को स्थानीय शासन की आधारभूत इकाई के रूप में मान्यता देने, ग्राम सभा को महत्व देने आदि की सिफारिश की गई। समिति की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सिफारिश यह थी कि पंचायती राज संस्थाओं को संविधान के अन्तर्गत सरकार का तृतीय स्तर घोषित किया जाना चाहिए और इस हेतु संविधान में एक नया अध्याय जोड़ा जाना चाहिए।

73 वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा संविधान में नया अध्याय जोड़कर पंचायती राज संस्थाओं को सरकार का तीसरा स्तर प्रदान कर इन्हें संवैधानिक मान्यता प्रदान कर दी गई है।

16 सितम्बर, 1991 को पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार द्वारा पंचायती राज के संबंध में 72वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। लोकसभा ने इस विधेयक की समीक्षा हेतु श्री नाथूराम मिर्धा (राजस्थान) की अध्यक्षता में संयुक्त प्रवर समिति का गठन किया।

इस समिति की सिफारिशों के आधार पर 22 दिसम्बर, 1992 को लोकसभा द्वारा तथा अगले दिन राज्य सभा में 73वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 पारित किया गया।

इस अधिनियम द्वारा यह अपेक्षा की गई थी कि देश की सभी राज्य सरकारें इस अधिनियम के लागू होने की तिथि से एक वर्ष के भीतर अपने पुराने प्रचलित पंचायती राज अधिनियमों को निरस्त कर 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के परिपेक्ष्य में नए पंचायती राज अधिनियम तैयार कर लागू करें।

इन्हीं निर्देशों की अनुपालना में राजस्थान सरकार ने अपने पुराने दोनों अधिनियमों को निरस्त कर एक नया पंचायती राज अधिनियम तैयार कर 23 अप्रैल, 1994 से लागू कर दिया है जिसे हम ‘राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994′ के नाम से पुकारते हैं।

इस अधिनियम के संदर्भ में ‘राजस्थान पंचायती राज नियम, 1996′ बनाए गए हैं जो 30 दिसम्बर, 1996 से लागू कर दिए गए है।

वित्तीय वर्ष 2015-16 में राज्य में पंचायतीराज संस्थाओं का 20 वर्ष बाद पुनर्गठन कर 47 नयी पंचायत समितियों एवं 723 नयी ग्राम पंचायतों का गठन किया गया है।

इस प्रकार राज्य में 295 पंचायत समितियाँ एवं 9894 ग्राम पंचायतें स्थापित हो गई हैं। राज्य सरकार द्वारा पंचायती राज संस्थाओं के विभिन्न पदों के लिए चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए शिक्षा संबंधी योग्यता निर्धारित की गई है।

जहां वर्ष 2010 में 10वीं पास से अधिक योग्यता वाला जिला परिषद् सदस्यों की संख्या 33 प्रतिशत, पंचायत समिति सदस्यों की संख्या 18 प्रतिशत तथा 8वीं पास सरपंचों की संख्या 22 प्रतिशत थी,

वहीं वर्ष 2015 में इनकी संख्या क्रमशः 70 प्रतिशत, 54 प्रतिशत व 48 प्रतिशत हो गई है।

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